Wednesday, July 31, 2019

"*नृत्य*"

ताल से ताल मिलाकर नाची,
हो कर मैं ऐसे आज मतवाली।
मन वीणा के तार झंकृत हो उठे,
गूँज उठी जब अम्बर में  स्वर लहरी।

प्रकृति ने अद्भुत आज रंग बिखेरे,
रंगों मेंं घुल मैं हो गई मन बावरी।
हवा के संग-संग मैं ऐसे लहराई,
मानो तुम संग निभाई मैने प्रीत पुरानी।

प्रकृति के संगीत में होता अनंतता का आभास,
पुलक उठी धरती,है जड़-चेतन मेंं हास।
थिरकने दो अब मेरे पगों को,बांध दो घुंघरू,
मत करो परिहास मेरा तुम, मत करो परिहास।
                                              मंजु पांगती

Wednesday, July 24, 2019

हिमा

सोना उगले मिट्टी मेरी ,
मिट्टी से ही वह निकली।

हवा से बतियाने वो चल दी,
भर दी सोने से झोली।

इस मिट्टी की गुड़िया ने सब की,
गर्व से कर दी छाती चौड़ी।

बात न पूछो दिल दारी की,
परमार्थ दे दी अपनी वेतन आधी।

सौंंधी खुशबू उसमें मिट्टी की,
जो हर हिय को है भाती।

देना उसकी है नियति,
पाने की कोई चाह नहीं।
             मंजु पांगती

(विज्ञान गल्प ) मीरा का खेत कक्षा 3,4,व 5के लिए

       आज मीरा बहुत खुश थी।लाॅकडाउन के कारण उसका परिवार गाँव आया था।शहर की घुटन भरी जिंदगी ने उस मासूम कली को प्राकृतिक रूप से पनपने का अवस...