सोना उगले मिट्टी मेरी ,
मिट्टी से ही वह निकली।
हवा से बतियाने वो चल दी,
भर दी सोने से झोली।
इस मिट्टी की गुड़िया ने सब की,
गर्व से कर दी छाती चौड़ी।
बात न पूछो दिल दारी की,
परमार्थ दे दी अपनी वेतन आधी।
सौंंधी खुशबू उसमें मिट्टी की,
जो हर हिय को है भाती।
देना उसकी है नियति,
पाने की कोई चाह नहीं।
मंजु पांगती
मिट्टी से ही वह निकली।
हवा से बतियाने वो चल दी,
भर दी सोने से झोली।
इस मिट्टी की गुड़िया ने सब की,
गर्व से कर दी छाती चौड़ी।
बात न पूछो दिल दारी की,
परमार्थ दे दी अपनी वेतन आधी।
सौंंधी खुशबू उसमें मिट्टी की,
जो हर हिय को है भाती।
देना उसकी है नियति,
पाने की कोई चाह नहीं।
मंजु पांगती
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