Wednesday, July 31, 2019

"*नृत्य*"

ताल से ताल मिलाकर नाची,
हो कर मैं ऐसे आज मतवाली।
मन वीणा के तार झंकृत हो उठे,
गूँज उठी जब अम्बर में  स्वर लहरी।

प्रकृति ने अद्भुत आज रंग बिखेरे,
रंगों मेंं घुल मैं हो गई मन बावरी।
हवा के संग-संग मैं ऐसे लहराई,
मानो तुम संग निभाई मैने प्रीत पुरानी।

प्रकृति के संगीत में होता अनंतता का आभास,
पुलक उठी धरती,है जड़-चेतन मेंं हास।
थिरकने दो अब मेरे पगों को,बांध दो घुंघरू,
मत करो परिहास मेरा तुम, मत करो परिहास।
                                              मंजु पांगती

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