आज मीरा बहुत खुश थी।लाॅकडाउन के कारण उसका परिवार गाँव आया था।शहर की घुटन भरी जिंदगी ने उस मासूम कली को प्राकृतिक रूप से पनपने का अवसर ही नहीं दिया था।9साल की मीरा शहर में रहते हुए हंसती जरूर थी।इच्छा पूरी न होने पर रोना, जिद कर के अपनी इच्छा पूरी करवा ही लेती थी।जिससे उसे बहुत अच्छा लगता था।घूमना -फिरना मौजमस्ती उसकी खुशी के पैमाने थे।
गाँव आकर यहाँ का जीवन उसे आनंदित कर रहा था।खुली हवा,मीठा-ठंडा पानी खेत-खलिहान उसे बरबस आकर्षित कर रहे थे।ये सब देखते -परखते वह न जाने कब उनसे घुल-मिल गई पता ही नहीं चला। उसे महसूस हो रहा था कि वो पेड़ -पौधों की भाषा भी समझने लगी थी।
आसमान में सूर्य मीरा के सिर के ऊपर चमक रहा था।उसे ध्यान आया कि अब तो दोपहर के भोजन का समय हो गया है।और वो पौधों से बतियाते-बतियाते घर से काफी दूर निकल आई है।वापस घर पहुँचने तक तो सब लोग खाना खा चुके होंगे। वो मुझे ढूंढ रहे होंगे।ये सब बाते मीरा अपने मन में सोचने लगी।
मीरा को इस तरह खामोश देख नन्हा पौधा बोला,"मीरा क्या सोच रही हो?"मीरा,"कुछ नहीं दोस्त। "नन्हा पौधा बोला,"मुझे पता है तुम्हें भूख लगी है न?आओ हमारे साथ खाना खा लो।"मीरा,तुम खाना बनाते हो ?"नन्हा पौधा बोला,"हाँ। ये हमारी पत्तियों का हरा रंग देख रही हो न,इसे पर्णहरित कहते हैं ।अंग्रेजी में इसे क्लोरोफिल कहते हैं ।"मीरा,"अच्छा तो ये तुम्हारा भोजन है?"नन्हा पौधा,"नहीं मीरा पर्णहरित के साथ हम और चीजें भी मिलाते हैं। जैसे खनिज लवण-पानी।हमारी जड़े जमीन से खींच कर तनों तक पहुंचाती हैं। "मीरा,"अच्छा जैसे हम हैण्ड पम्प से पानी खींचते हैं ?"नन्हा पौधा,"हाँ बिलकुल सही कहा। जड़ो का काम तने तक खनिज लवण युक्त पानी पहुँचाना होता है।और तना इसे पत्तियों तक पहुंचाता है।"मीरा,"अच्छा हमें तो खाना बनाने के लिए आग भी जलानी पड़ती है।नन्हा पौधा,"हाँ हमारा खाना सूर्य के प्रकाश से गरम होता है।इसीलिए हम सिर्फ दिन में ही खाना बनाते हैं। एक और चीज चाहिए होती है हमें खाना बनाने के लिए वो है कार्बन डाई ऑक्साइड गैस,वो हम वायुमंडल से लेते हैं। सभी प्राणी सांस लेने में आक्सीजन गैस लेते हैं और कार्बन डाई ऑक्साइड गैस छोड़ते हैं,हम उसी कार्बन डाई ऑक्साइड गैस को खाना बनाने के लिए प्रयोग करते हैं। हम खाना बनाने की प्रक्रिया को प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं ।
मीरा,"तुम सांस भी लेते हो?"नन्हा पौधा ,"हाँ-हाँ हम भी तो प्राणी हैं,तभी तो खाना बनाते हैं,खाते हैं,बढ़ते है,सिर्फ चल नहीं सकते। अरे बातों में तो हम भोजन करना ही भूल गये चलो जल्दी "मीरा,"हाँ बहुत भूख लगी है ।आज तुम्हारे साथ खाना खाने में मजा आएगा चलो।"
मीरा क्या बडबडा रही हो उठो!सुबह हो गई ।मीरा,"ओह माँ कितना प्यारा सपना था,तुम ने जगा दिया।"आज मीरा का मन बहुत खुश था।वो खुद को पेड़-पौधों के बहुत करीब महसूस कर रही थी।
मंजु पांगती
प्र.अ.रा.प्रा.वि.ग्वालदम (थराली)चमोली उत्तराखंड
गाँव आकर यहाँ का जीवन उसे आनंदित कर रहा था।खुली हवा,मीठा-ठंडा पानी खेत-खलिहान उसे बरबस आकर्षित कर रहे थे।ये सब देखते -परखते वह न जाने कब उनसे घुल-मिल गई पता ही नहीं चला। उसे महसूस हो रहा था कि वो पेड़ -पौधों की भाषा भी समझने लगी थी।
आसमान में सूर्य मीरा के सिर के ऊपर चमक रहा था।उसे ध्यान आया कि अब तो दोपहर के भोजन का समय हो गया है।और वो पौधों से बतियाते-बतियाते घर से काफी दूर निकल आई है।वापस घर पहुँचने तक तो सब लोग खाना खा चुके होंगे। वो मुझे ढूंढ रहे होंगे।ये सब बाते मीरा अपने मन में सोचने लगी।
मीरा को इस तरह खामोश देख नन्हा पौधा बोला,"मीरा क्या सोच रही हो?"मीरा,"कुछ नहीं दोस्त। "नन्हा पौधा बोला,"मुझे पता है तुम्हें भूख लगी है न?आओ हमारे साथ खाना खा लो।"मीरा,तुम खाना बनाते हो ?"नन्हा पौधा बोला,"हाँ। ये हमारी पत्तियों का हरा रंग देख रही हो न,इसे पर्णहरित कहते हैं ।अंग्रेजी में इसे क्लोरोफिल कहते हैं ।"मीरा,"अच्छा तो ये तुम्हारा भोजन है?"नन्हा पौधा,"नहीं मीरा पर्णहरित के साथ हम और चीजें भी मिलाते हैं। जैसे खनिज लवण-पानी।हमारी जड़े जमीन से खींच कर तनों तक पहुंचाती हैं। "मीरा,"अच्छा जैसे हम हैण्ड पम्प से पानी खींचते हैं ?"नन्हा पौधा,"हाँ बिलकुल सही कहा। जड़ो का काम तने तक खनिज लवण युक्त पानी पहुँचाना होता है।और तना इसे पत्तियों तक पहुंचाता है।"मीरा,"अच्छा हमें तो खाना बनाने के लिए आग भी जलानी पड़ती है।नन्हा पौधा,"हाँ हमारा खाना सूर्य के प्रकाश से गरम होता है।इसीलिए हम सिर्फ दिन में ही खाना बनाते हैं। एक और चीज चाहिए होती है हमें खाना बनाने के लिए वो है कार्बन डाई ऑक्साइड गैस,वो हम वायुमंडल से लेते हैं। सभी प्राणी सांस लेने में आक्सीजन गैस लेते हैं और कार्बन डाई ऑक्साइड गैस छोड़ते हैं,हम उसी कार्बन डाई ऑक्साइड गैस को खाना बनाने के लिए प्रयोग करते हैं। हम खाना बनाने की प्रक्रिया को प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं ।
मीरा,"तुम सांस भी लेते हो?"नन्हा पौधा ,"हाँ-हाँ हम भी तो प्राणी हैं,तभी तो खाना बनाते हैं,खाते हैं,बढ़ते है,सिर्फ चल नहीं सकते। अरे बातों में तो हम भोजन करना ही भूल गये चलो जल्दी "मीरा,"हाँ बहुत भूख लगी है ।आज तुम्हारे साथ खाना खाने में मजा आएगा चलो।"
मीरा क्या बडबडा रही हो उठो!सुबह हो गई ।मीरा,"ओह माँ कितना प्यारा सपना था,तुम ने जगा दिया।"आज मीरा का मन बहुत खुश था।वो खुद को पेड़-पौधों के बहुत करीब महसूस कर रही थी।
मंजु पांगती
प्र.अ.रा.प्रा.वि.ग्वालदम (थराली)चमोली उत्तराखंड
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