Thursday, June 27, 2019

गज़ल

मोहब्बत में तुमको दगा हम न देंगे,
वफा की है हमने वफा ही करेंगे।

मोहब्बत मेंं कैसी ये फिरकापरस्ती,
दिल दिया है हमने दिललगी करेंगे।

मोहब्बत न सिर्फ जिस्म-ऐ-जान से होती,
वतन से मोहब्बत हम सब से पहले करेंगे।

मोहब्बत वो कैसी जो हो सोची-समझी,
जो डूबे हैं इसमें वो इबादत करेंगे।
                             मंजु पांगती

Tuesday, June 25, 2019

गज़ल

किस तरह तुमको बताऊँ दर्द अपना निभाएँ,
बाँट दो खुशियाँ गैरों में दर्द अपना निभाएँ।

देखकर तेरी शान ए शौकत तेरी महफिल की तरुन्नुम,
कुछ बेवजह मौतें यहाँ कैसे रोऐं कैसे हंसना निभाएँ।

मुस्कुराहट तेरे लबों की तेरे नैनों की चपलता
जानते हैं मंशा तेरी कैसे कह दें कैसे रहना निभाएँ।

सोए रहो तुम जागती आँखों से प्यारों
हमें बेवफा समझे हो कैसे तुम्हारा जगना निभाएँ।
                  मंजु पांगती

Saturday, June 22, 2019

बचपन

वो बचपन के खेल सुहाने याद आए हैं आज,
हमने भी पैरों के छाप छोड़े थे खयालोंं के समुंदर मेंं।

बचपन की वो कल्पनाऐं जैसे कच्ची मिट्टी के घरोंदे,
मन बावरा फिर निकल पड़ा आज छाया पकड़ने समुंदर में।

रेत की मानिंद ढ़ह गये सपने सारे बचपन के,
मिलते ही जैसे नदियों का पानी हो जाता खारा समुंदर मेंं।

उम्र निकल रही है अब जैसे बंद मुट्ठी की रेत,
वो बचपन हिलोरें मार रहा फिर से जैसे लहरें समुंदर मेंं।
                           मंजु पांगती

Friday, June 21, 2019

योगा दिवस

योगा शब्द ही इतना भारी पड़ता,
ऊपर से सरकार का डंडा।

क्या करे सरकारी नौकर बंदा,
मजबूरी बन गई गले का फंदा।

पेट सम्भाले सम्भल नहीं पाता,
फिर भी सूर्य नमस्कार करना पड़ता।

आम जन खून-पसीना रोज बहाता,
फिर भी वह बीमार पड़ जाता।

उसकी बीमारी की जड़ को पकड़ो,
करोड़ों रुपये यूँ ही न खर्चों।

नियमित योगा जो बंदा करता,
योगा दिवस उसी का मनता।

बाकी सब कुछ छलावा है,
 फोटो खींच सत्यापित ही करवाना है।
                              मंजु पांगती
       


Wednesday, June 19, 2019

कुछ कह न सके

आजाद हैं लब मेरे
 फिर भी हम कुछ कह न सके,
सही गलत सब देख रहे हैं
फिर भी हम कुछ कह न सके।

हृदय द्रवित है मन बोझिल है,
लानत खुद को भेज रहे हैं।
मोमबत्ती संग प्रतिशोध जला कर,
फिर भी हम कुछ न सके।

दलित हत्याऐं मन कचोट रही हैं,
मानव मानव पर हावी है,
समरसता की चाह सभी को,
फिर भी हम कुछ कह न सके।
                 मंजु पांगती

Tuesday, June 18, 2019

मासूम कलियाँ

अपने चमन की मासूम कलियाँ,
खिलने को बेताब थी,
पर वे तो अनजान थी,
चमन मेंं पलते हुए दरिंदों से।।
    चिकनी-चुपड़ी बातों से उनकी,
     कलियाँ ज्योंही महक उठी,
     नापाक इरादों ने तब छीनी,
     उनके चेहरे की नूरानी।।
डरी सहमी असमंजस मेंं थी वो,
समझ न सकी हालातों को,
पलक झपकते रौंद दिया तब,
उन कमसिन,सुकुमार कलियों को।।
       चीत्कार से गूँज उठा अम्बर,
        धरती की छाती फट पड़ी,
         भूल गया वह वहशी दरिंदा,
          बेटी उसके घर में भी थी।।
                        मंजु पांगती

गज़ल

मन उपवन मेरा महक उठा बन के रातरानी,
कुछ पल का साथ तुम्हारा जैसे महके रातरानी।

मेरे दिल की धडकनों से इस कदर जुड़ गए हो,
जैसे गुंथकर हर फूल गजरे मेंं महके रातरानी।।

एहसास तेरे होने का सिखा गया मुझे जीना,
जी रही हूँ अब मैं ऐसे जैसे महके रातरानी।।

तेरी अहमियत क्या है वो तो मैं जानूं,
तुम भरोसा विश्वास मेरा जैसे महके रातरानी।।
                                              मंजु पांगती।

(विज्ञान गल्प ) मीरा का खेत कक्षा 3,4,व 5के लिए

       आज मीरा बहुत खुश थी।लाॅकडाउन के कारण उसका परिवार गाँव आया था।शहर की घुटन भरी जिंदगी ने उस मासूम कली को प्राकृतिक रूप से पनपने का अवस...