Sunday, June 21, 2020

(विज्ञान गल्प ) मीरा का खेत कक्षा 3,4,व 5के लिए

       आज मीरा बहुत खुश थी।लाॅकडाउन के कारण उसका परिवार गाँव आया था।शहर की घुटन भरी जिंदगी ने उस मासूम कली को प्राकृतिक रूप से पनपने का अवसर ही नहीं दिया था।9साल की मीरा शहर में रहते हुए हंसती जरूर थी।इच्छा पूरी न होने पर रोना, जिद कर के अपनी इच्छा पूरी करवा ही लेती थी।जिससे उसे बहुत अच्छा लगता था।घूमना -फिरना मौजमस्ती उसकी खुशी के पैमाने थे।
      गाँव आकर यहाँ का जीवन उसे आनंदित कर रहा था।खुली हवा,मीठा-ठंडा पानी खेत-खलिहान उसे बरबस आकर्षित कर रहे थे।ये सब देखते -परखते वह न जाने कब उनसे घुल-मिल गई पता ही नहीं चला। उसे महसूस हो रहा था कि वो पेड़ -पौधों की भाषा भी समझने लगी थी।
    आसमान में सूर्य मीरा के सिर के ऊपर चमक रहा था।उसे ध्यान आया कि अब तो दोपहर के भोजन का समय हो गया है।और वो पौधों से बतियाते-बतियाते घर से काफी दूर निकल आई है।वापस घर पहुँचने तक तो सब लोग खाना खा चुके होंगे। वो मुझे ढूंढ रहे होंगे।ये सब बाते मीरा अपने मन में सोचने लगी।
    मीरा को इस तरह खामोश देख नन्हा पौधा बोला,"मीरा क्या सोच रही हो?"मीरा,"कुछ नहीं दोस्त। "नन्हा पौधा बोला,"मुझे पता है तुम्हें भूख लगी है न?आओ हमारे साथ खाना खा लो।"मीरा,तुम खाना बनाते हो ?"नन्हा पौधा बोला,"हाँ। ये हमारी पत्तियों का हरा रंग  देख रही हो न,इसे पर्णहरित कहते हैं ।अंग्रेजी में इसे क्लोरोफिल कहते हैं ।"मीरा,"अच्छा तो ये तुम्हारा भोजन है?"नन्हा पौधा,"नहीं मीरा पर्णहरित के साथ हम और चीजें भी मिलाते हैं। जैसे खनिज लवण-पानी।हमारी जड़े जमीन से खींच कर तनों तक पहुंचाती हैं। "मीरा,"अच्छा जैसे हम हैण्ड पम्प से पानी खींचते हैं ?"नन्हा पौधा,"हाँ बिलकुल सही कहा। जड़ो का काम तने तक खनिज लवण युक्त पानी पहुँचाना होता है।और तना इसे पत्तियों तक पहुंचाता है।"मीरा,"अच्छा हमें तो खाना बनाने के लिए आग भी जलानी पड़ती है।नन्हा पौधा,"हाँ हमारा खाना सूर्य के प्रकाश से गरम होता है।इसीलिए हम सिर्फ दिन में ही खाना बनाते हैं। एक और चीज चाहिए होती है हमें खाना बनाने के लिए वो है कार्बन डाई ऑक्साइड गैस,वो हम वायुमंडल से लेते हैं। सभी प्राणी सांस लेने में आक्सीजन गैस लेते हैं और कार्बन डाई ऑक्साइड गैस छोड़ते हैं,हम उसी कार्बन डाई ऑक्साइड गैस को खाना बनाने के लिए प्रयोग करते हैं। हम खाना बनाने की प्रक्रिया को प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं ।
मीरा,"तुम सांस भी लेते हो?"नन्हा पौधा ,"हाँ-हाँ हम भी तो प्राणी हैं,तभी तो खाना बनाते हैं,खाते हैं,बढ़ते है,सिर्फ चल नहीं सकते। अरे बातों में तो हम भोजन करना ही भूल गये चलो जल्दी  "मीरा,"हाँ  बहुत भूख लगी है ।आज तुम्हारे साथ खाना खाने में मजा आएगा चलो।"
    मीरा क्या बडबडा रही हो उठो!सुबह हो गई ।मीरा,"ओह माँ कितना प्यारा  सपना था,तुम ने जगा दिया।"आज मीरा का मन बहुत खुश था।वो खुद को पेड़-पौधों के बहुत करीब महसूस कर रही थी।

        मंजु पांगती
         प्र.अ.रा.प्रा.वि.ग्वालदम (थराली)चमोली उत्तराखंड

Saturday, June 20, 2020

शेखी बाज मक्खी कक्षा 3 पाठ-2

एक जंगल में एक शेर,भोजन कर के  आराम  था  कर  रहा।
मक्खी उड़ती हुई आई,देखा दो दिन से न था  स्नान   किया।।

नींद में था शेर सुन्दर सी,भिनभिनाने  लगी कान  में  मक्खी ।
खलल पड़ने से नींद  में,शेर की तगड़ी डांट मक्खी को पड़ी ।।

दूर हट वर्ना मार डालूंगा,मक्खी बोली छि  इतनी गंदी भाषा ।
गुस्सा आया शेर को अब,मुँह चलाती है भंग कर मेरी  निद्रा ।।

मक्खी बोली क्या करोगे ,आता  है  मुझको  तुम  से  लड़ना।
चुनौती से तिलमिलाया शेर,मारा जोर से अपने कान में पंजा।।

मक्खी तो भागी उड कर, पर कान शेर का थोड़ा छिल गया ।
अब मक्खी नाक में बैठी,फिर नान का भी  वही  हाल  हुआ।।

माथा,गाल कभी गरदन,मक्खी बारी-बारी उन पर जाती बैठ।
मारता शेर तब-तब पंजा, हुआ लहू-लुहान शेर तब घटी ऐंठ ।।

थक कर ऊब गया  शेर,मक्खी से हाथ जोड़ कर माफी मांगी ।
मक्खी बहन छोड़ो अब, मान लिया मैं हारा और  तुम  जीती।।

मद में चूर हो कर मक्खी,उड़ते-उड़ते  अब  आगे  को  बढ़ी ।
राह में हाथी मिला उसे, तो  इतराकर  अपनी  कथा  सुनायी ।।

शेर को हराया है मैने,अब तो जंगल में  मैं  ही राज  करूँगी ।
हाथी प्रणाम करो मुझे,बिन बहस हाथी ने अपनी सूंड उठाई।।

आगे उसे लोमड़ी मिली,फिर वही  बात  मक्खी ने  दुहरायी।
लोमड़ी ने मानी बात,साथ ही मन में मक्खी के आग लगा दी।।

जाले में बैठी थी मकड़ी,भड़क चुकी थी लोमड़ी द्वारा मक्खी।
मद में अंधी मक्खी झपटी,जाले में फंस गई अब खुद मक्खी।।

कोशिशअब बेकार लगी,निकल  न  सकी  हार  गयी  मक्खी।
गर्व करो पर घमंड नहीं, वरना  मक्खी  जैसी   हालत   होगी।।

मंजु पांगती
प्र.अ.रा.प्रा.वि.ग्वालदम (थराली) चमोली









Friday, June 19, 2020

चाँद वाली अम्मा कक्षा 3 पाठ-3

बूढ़ी अम्मा जो रहती अकेली,बहुत  पुरानी  है  यह  तो  बात।
खुद ही करती थी काम सारा,कोई नहीं रहता था उसके साथ।।

चूल्हा-चौका,बर्तन-पानी करती,एक बात से होती थी  हैरान।
आँगन झाड़ने जैसे झुकती वो ,करता आसमान उसे परेशान।।

झुकी नहीं ज्यों ही झाडू ले कर,टकरा जाताआसमान पीठ पर।
घूरती उसे बुढ़िया गुस्से से जब,आसमान पीछे को जाता  हट।।

एक  बार  नहीं  दो-तीन  दफा,रोज-रोज  ऐसा  ही होता रहा।
अम्मा झुकती झाड़ने कोआँगन,आसमान  तंग  करता  रहता।।

एकदिन पनघट पर पानीभरते,झगड़ा किसी से हुआअम्माका।
घर आकर आँगन लगी झाड़ने,आसमान ने बुढ़िया को छेड़ा ।।

बहुत गुस्से में थी आज बुढिया,झाडू से देमारा आसमान को।
आदत से मजबूर गगन  था,बार-बार छेड़ा उसने बुढ़िया को ।।

शरारत सूझी आसमान को,झाडू पकड़  खींचा  बुढिया  को।
इकलौता झाडू है यह मेरा,बुढ़िया ने पकड़ा कसकर झाडूको।।

रस्साकशी हुई देर तक,आसमान ऊपर को अब उठने लगा।
चिल्लाई बुढ़िया छोड़ो,नभ बोला  झाडू  अब  वहीं  लगाना।।

बुढ़िया पड़ गई आफत में, झाडू  को अब  वो  कैसे  छोड़े।
तभी अम्मा को चाँद दिखा, अपने पैर वहाँ पर  जमा दिये ।।

आसमान ने सोचा अब तो,चंदा बुढ़िया की तो मदद करेगा।
हार मेरी निश्चित होनी है,यह सोच  उसने  झाडू  को  छोड़ा ।।

इतनी थक गई थी बुढ़िया,झाडू पकड़े बैठी रह गई चाँद पर।
आसमान तो चला गया था,अम्मा न लौटी  कभी धरती  पर ।।

मंजु पांगती
प्र.अ.रा.प्रा.वि.ग्वालदम (थराली)चमोली


Thursday, June 18, 2020

बहादुर बित्तो कक्षा 3 पाठ-5

एक किसान बीबी संगअपनी,खुशी से रहता था एक गाँव में ।
बीबी बित्तो थी  बड़ी  सयानी,दिमाग लगाती वह हर काम में ।।

खेत जोत  रहा  था  किसान ,एक दिन है सुबह की यह बात ।
अचानक शेर आ कर बोला,बैल दे-दे मुझको ऐ मानव जात। ।

बैल न देगा तो खाऊँगा तुझे,सोच ले किसान एक बार फिर से।
किसान बहुत गिड़गिड़ाया,इंतजार करो  मैं पूछता हूँ बीबी से।।

पूछा बित्तो ने तुम क्या बोले,कर आया हूँ समझौता शेर से ।
कैसा समझौता चौंकी बित्तो,बैल के बदले गाय को खा ले।।

फटकारा बित्तो ने बेशर्म हो,किसान झेंप गया बुरी तरह से।
घोड़ा ले कर बीबी आ रही,जल्दी जा कर कह दो शेर  से ।।

किसान डर के शेर से बोला,गाय  हमारी  बड़ी  मरियल  है ।
घोड़ा  है एक  मोटा  ताजा,ले कर उसे मेरी बित्तो आ रही है।।

घोड़ा दौड़ाती बित्तो पहुंची,बोली यह तो एक शेर है चार कहाँ।
मालूम तुम्हें होना चाहिए,बिन चार शेर खाये पेट भरता कहाँ।।

यह सुन कर शेर डर गया,समझ न सका औरत है या राक्षसी।
बुरा फंसा मैं तो आज,भागा शेर वहाँ से मति मेरी मारी गयी।।

तब किसान से बित्तो बोली,देख ली आज तुमने मेरी बहादुरी ।
तुम इतने डरपोक हो कैसे,आज तो गवां दी थी गाय  बेचारी ।।

भूख से शेर की आंते सूखी, और थी चेहरे पर  छाई  उदासी ।
क्या बात है भेड़िये ने पूछा,बोला  राक्षसी आज   एक  मिली।।

हैरान हो जाओगे सुन कर,नाश्ता रोज वो चार शेरों का करती।
सुन कर भेड़िया बहुत हंसा,छिप कर देखी थी सारी झलकी ।।

राक्षसी नहीं बित्तो  है  वह,देखो एक कोशिश  फिर से  करो ।।
बैल अगर न हाथ आये ,तो जो चाहो तुम मेरा नाम बदल दो।।

लाख समझाकर माना,बोला पूँछ बाँध कर दोनों साथ चलेंगे।
चले दोनों पूँछ बाँध कर,यह देख किसान के  फिर  हो उड़े।।

बित्तो बिल्कुल न घबरायी,और चीखी जोर  से  दहाड़  लगा।
भेड़िए तूने वादा न निभाया,चार के बदले एक ही शेर लाया।।

सुनते ही शेर के होश उड़े,लगा उसे भेड़िए ने धोखा है दिया।
भेड़िया चिल्लाता रह गया,बिन सुने शेर भागता- भागता रहा।।

बित्तो की हिम्मत रंग लाई,अब शेर कभी  वापस न  आएगा।
बुद्धि और हिम्मत का मेल,जो करेगा सफलता वो ही पाएगा।।

मंजु पांगती
प्र.अ.रा.प्रा.वि.ग्वालदम (थराली)चमोली


Wednesday, June 17, 2020

टिपटिपवा कक्षा 3 पाठ-7

एक दादी और पोते की, चलो आज एक कहानी सुनते  हैं।
पोता रोज कहानी सुनता,दादी रोचक कहानियाँ सुनाती है।।

बरसात का वो मौसम था,हर रोज खूब पानी बरस रहा था।
आज  वर्षा बहुत तेज थी,गाँवअब बहुत दुखी हो चुका था ।।

झोपड़ी पुरानी थी बुढ़िया की, अंदर  पानी  टपक रहा  था।
टप-टप,टप-टप पानी टपका,दादी का मन दुखी हो रहा था।।

पोता  अपनी  जिद पर  था ,सुनाने को कहानी कह रहा था।
दादी तो झुंझला रही  थी ,  अब तक पोता  जिद में ऐंठा था।।

क्या कहानी सुनाऊँ बचवा,दिल में टिपटिपवा का डर है बैठा।
पोता  झट उठ  कर बैठा,पूछा फिर टिपटिपवा होता है कैसा।।

बाघ और शेर से भी बड़ा, दादी जानवर कोई  होता  है क्या।
बाघ आए चाहे आए शेर,ज्यादा डर टिपटिपवा से ही लगता।।

एक बाघ बारिश से बचने,छिपा बैठा था झोपड़ी के ही पीछे ।
सुनकर दादी पोते की बाते,भागा बाघ और डर से छूटे पसीने।।

उसी गाँव में था एक घोबी,बारिश से वह भी  था  बहुत  दुखी ।
गधा गायब था भोर से, ढूंढते-ढूंढते अब  उसकी नजर थकी ।।

बारिश में वो भीग चुका था, अब  सुबह  से लेकर  शाम  हुई ।
बीबी बोली पंडित जी से पूछो,भूत-भविष्य के हैं वो  ज्ञानी ।।

अपना लट्ठा ले  कर  धोबी, पहुंच गया  घर  पंडित  जी  के ।
देखा उसने पंडित जी भी,जमा हुआ वर्षा जल थे उलीच रहे।।

विनती कर के धोबी बोला,खो गया गधा जरा पोथी बांच दो ।
पंडित जी झुंझला कर बोले,जा कर  गड्ढे  पोखर में  ढूंढ  लो।।

डांट खा कर पंडित जी की,दुखी मन धोबी वहाँ से चला गया।
चलते - चलते  वह   धोबी, एक तालाब  किनारे  जा  पहुंचा ।।

ऊँची-ऊँची वहाँ घास उगी थी,धोबी गधे को वहाँ  ढूँढने लगा ।
टिपटिपवा के डर से बदकिस्मत,वह बाघ वहाँ जा  बैठा था ।।

अंधेरा हो चला था  अब  तक, बाघ को गधा समझ बैठा धोबी।
 दे  मारा धोबी ने  लट्ठे  से,बाघ को हमले की ऐसीआस न थी।।

घबरा गया  बाघ  बेचारा,लगा कि टिपटिपवा अब आ ही गया।
जान बचाने की  खातिर ,चुपचाप  धोबी  संग वह  चल दिया।।

कान पकड़े बाघ का धोबी,बढ़  चला  घर  की  ओर  अपने ।
घर  पहुँच  कर  धोबी  ने ,बाँध  दिया  तब  उसको  खूँटे से।।

सुबह लोगों ने  देखा  जब, बाघ घर में  खूँटी से बंधा हुआ था ।
बच्चोंअनदेखे डर के कारण,बाघ अपनी ताकत भूल गया था।।

मंजु पांगती
प्र.अ.रा प्रा.वि.ग्वालदम (थराली)चमोली






Tuesday, June 16, 2020

मीरा बहन और बाघ कक्षा 3 पाठ -11

इंग्लैंड  की थी रहने  वाली,  मीरा  बहन  था  उनका  नाम।
छोड़ अपने माता-पिता को,किया भारत में सेवा का काम।।

गांधी जी  से हुई  प्रभावित,भरा था उन में  भी  सेवा भाव।
आजादी के पाँच साल बाद,चुना उन्होंने एक पहाड़ी गाँव। ।

रह  कर  गेवली  गावँ  में ,स्थापित किया गोपाल आश्रम।
पाला पालतू जानवरों को , दिन  भर  करती  बेहद  श्रम।।

नजदीक  के घने जंगल में, जहाँ  रहते  थे  बाघ  अनेक ।
जंगल के पेड़ काटे गये थे,बनाई गई थी वहाँ सड़क एक।।

 शिकार की तलाश में अब,बाघ घुस जाते अक्सर गाँव में।
रात  अंधेरा  होते  ही  सब,ग्रामीण जीते  डर  के  साये में । ।

फिर एक दिन घटना घटी ,मार डाला गाय को एक बाघ ने।
सुबह होते ही आग की भांति, फैल गई खबर पूरे  गाँव  में। ।

सोच विचार में पड़ गए लोग,सोचा ऐसा तो अब नित होगा।
गाय,कुत्ता और कभी मनुष्य,शिकार बाघ का जरूर बनेगा। ।

ग्राम वासी मिल कर फिर सब,गये मीरा बहन के आश्रम पर।
सोच विचार हुआ बहुत तब, पहुँचे बाघ कैद के निष्कर्ष  पर।।

लोहे का पिंजड़ा हुआ तैयार,बकरी को अंदर बांधा  जाएगा।
बाघ आएगा जैसे  ही अंदर , पिंजड़ा स्वत: बंद  हो  जाएगा।।

योजना तो थी बड़ी सधी हुई ,सोगये  रात  सब  खुशी-खुशी ।
पिंजड़ा  जहाँ  था रखा  गया,वह जगह आश्रम के करीब थी।।

सुबह बड़े कौतूहल  से  लोग,देखने को पिंजड़ा सब चल पड़े।
दूर  से देखा  बंद  दरवाजा,विश्वास भरी खुशी से उछल पड़े। ।

दौड़ के पहुँचे पास पिंजड़े के, देख  कर चकित सब रह गये।
पिंजड़ा तो  खाली  पड़ा  था,बंद दरवाजे की सब  सोच  रहे।।

सोचा जरा पूछ लें बहन  से,जानें क्या हुआ होगा  कल  रात।
आश्रम  पहुँच  सबने  पूछा, बताई   बहन  ने  अपनी   बात ।।

बोली बहन जी देखो भाई,मैं तो सो न सकी  कल  रात  भर।
ठीक न समझा धोखा देना, मैं  आ  गई  दरवाजा  बंद  कर ।।

दया,सच्चाई की वो मूरत ,जानवर को भी धोखा  दे  न  की।
यह देख-सुनकर  सब  ने ,दिल से प्रशंसा मीरा बहन की, की।।

मंजु पांगती
प्र.अ.रा.प्रा.वि.ग्वालदम (थराली)चमोली 

Monday, June 15, 2020

"जब मुझको साँप ने काटा। कक्षा- 3पाठ 12

एक छोटा सा साँप, रेंगे  रहा  था  आँगन  में।
डर गया देख मुझे,घुस गया नारियल खोल में ।।

मुँह बंद कर खोल का,मैं लेगया  नानी के  पास।
निकली चीख नानी की,जोर से बोली साँप-साँप।।

सुनकर  चीख  नानी की , आए  नाना   दौड़   कर ।
फैंक नारियल खोल को,जान बची साँप की भागकर।।

नाना  लगे   समझाने ,ऐसा  काम  न  करना  फिर ।
होते साँप जहरीले हैं,खतरा  मोल  न  लेना  फिर ।।

उसी शाम फिर से  मैं  ,   लगा  पकड़ने  बर्र   को ।
काट खाया उसने मुझे, सह  न  सका  मैं  दर्द को ।।

नीली पड़ी थी अंगुली,दिखाने गया  मैं   नानी  को ।
लेकर  मुझे  गोद  में , नाना  जी  दौड़े  बाहर  को ।।

बाग-बगीचे ,खेतों को , लाँघे-फांदे  , भागे-भागे ।
छोटी सी एक झोपड़ी के,सम्मुख जाकर वे रूके ।।

एक  बूढ़ा  सा  आदमी , निकला  घर से   बाहर ।
सर्प  दंश  के  मंत्र  से   , था निकालता वो जहर ।।

देखी अंगुली मेरी जब , बिठा दिया मुझे चुपचाप ।
पीतल पात्र में पानी ला,करने लगा मंत्र का जाप ।।

कोशिश की मैने बहुत,बताने  की  असली  बात ।
कस कर पकड़े दादा ,हर बार पड़ी मुझे डांट। ।

दर्द मेरा जा चुका था,कौन  सुनता  मेरी बात ।
झाड़-फूंक चलती रही,सहना पड़ा सब बेबात। ।

नानी और पड़ोस सब,देख तमाशा थे उदास ।
कुछ भी न बोलने की,दी हिदायत मुझे खास ।।

मंत्र   पढ़े  उस  पानी  से , अंगुली  मेरी  धोई  गई  ।
उस पानी को पिलाकर,जान में जान सबकी आई।।

गर्व से तब बूढ़ा बोला ,समय  से  आए  मेरे पास ।
जहरीले सर्प  दंश  से, वर्ना न बचता बच्चा  आज।।

नतमस्तक थे सभी , खुद को  समझ रहे थे  धन्य ।
घर पहुँच कर नाना ने,भेजी  खुशी  से  भेंटें अन्य।।

मंजु पांगती
प्र.अ. रा.प्रा.वि.ग्वालदम (थारली )चमोली।

Sunday, June 14, 2020

गज़ल

कभी गर कह दिया होता कि गम जिंदगी का है।
खुशी कब मिल सकी सबको भरम जिंदगी का है।।

असीमित चाहतों ने ही हमें गुमराह  कर  के यूँ ।
डुबोया इस तरह अवसाद जखम जिन्दगी का है।।

खुशी के मायने  हमको यही  लगते  हमेशा  से।
अमीरी में मिला सबको मरहम जिंदगी का  है।।

बड़े बेचैन होते हम कभी  संतोष  होगा  मन ।
सरलता से जिऐं लम्हात सरगम जिंदगी का है।।

मंजु पांगती" मन"मुनस्यारी पिथौरागढ़ 

Friday, June 12, 2020

"सबसे अच्छा पेड़ " कक्षा 3 पाठ 14

अच्छे होते तरू सभी,उनके नाम अनेक।
रसाल,कदली,नारियल,भाये तुरन्त देख।।

घर खोजने का विचार,आया उनको आज।
सोचा था हो  जाएगा, पूरा  उनका  काज।।

गर्मी    की   दुपहरी  में , चले  तीनो  भ्रात।
देख कर पेड़ आम  का ,बैठ गये सब  साथ।।

भूख लगी थी जोरो  से , तन मांगे  आराम  ।
खा मीठा  आम  वहाँ , बना अग्रज का धाम।।

अचार व अमचूर  बना , मिलेगा अच्छा दाम ।
बाकी फल पक जाने पर,होगा खाने का काम।।

बढ़  चले  दोनों  आगे , देखी  कदली  डाल।
तभी काले बदल  ने,चल दी अपनी चाल ।।

भीगने से बचने को ,लाये केला पत्ता तोड़।
छतरी बनी प्यारी-सी,थाली भी बेजोड़ ।।

भोजन और केला खा,नाचा मन का मोर ।
यहीं रहूँगा  सोच कर ,हुआ भाव विभोर ।।

सब्जी बनेगी केले की,खाऊँगा भी खूब ।
भर-भर पेटी बेचूंगा ,बनूंगा मैं मजबूत ।।

चल लिया आगे छोटा,मिला नारियल पेड़।
वह पतला लम्बा सा था,लगे नारियल ढेर।।

मीठे नारियल पानी से,बूझाई उसने प्यास।
उस छोटी छाया में बैठ,सोच रहा कुछ खास।

नीम रबड़ के पेड़ की,सोच रहा  वह  खूबी ।
अब नारियल पेड़ तले,रहने की उसको सूझी।।

मंजु पांगती
प्र.अ.
रा.प्रा.वि.ग्वालदम


Thursday, June 11, 2020

शून्य की अवधारणा

आओ बच्चों आज खेलें एक खेल,
गिनती की जिसमें रेलम पेल।
एक से एक मिलकर बनती,
रेल गिनती की आगे बढ़ती।

बीच बीच में भाई स्टेशन आते,
इकाई के अंक दुहराऐ जाते।
इकाई दहाई,सैकड़ा,हजार,
दस हजार,लाख,दस लाख ।

और भी आगे स्टेशन आते,
करोड़,दस करोड़ , अरब।
दस अरब,खरब,दस खरब,
नील,दस नील और अनंत।

फिर भी  हम  कुछ  भूल  रहे,
गिनती बिन जिसके अधूरी रहे।
कैसे बना दहाई ,कैसे  सैकड़ा,
हम को तब कुछ सोचना पड़ा।

एक करामाती हमें अंक मिला,
नाम उसका तब  शून्य  रखा।
गिनती  की रेल  सरपट भागी,
पूर्णता,सरलता गिनती ने पायी।

अकेले शून्य का  कोई  मान  नहीं ,
अंकों संग मिल बढ़ता सम्मान वहीं ।
शून्य की महिमा अब जानो भाई,
मस्ती से  बन  जाए  अब  दहाई।

दहाई  माने  दस  गुना  जानों,
इकाई में एक शून्य  लगाओ।
एक दहाई दस,दो दहाई बीस,
अंत में पहुँचो दस दहाई सौ।

सौ  माने  सैकड़ा  जानों
इकाई में दो शून्य लगाओ।
एक सैकड़ा सौ,दो सैकड़ा दो सौ,
अंत में पहुँचो सौ दहाई हजार ।

हजार माने हजार ही जानों,
इकाई में शून्य तीन लगाओ।
ऐसे ही गिनती आगे बढ़ाओ,
साथ- साथ में गाते जाओ।

शून्य कितना करामाती  है,
इसकी खोज भारत ने की है।
गिनते-गिनते जब थक जाय,
संख्या वह अनंत कहलाय।

मंजु पांगती
प्र. अ.
रा.प्रा.वि.ग्वालदम






Wednesday, June 10, 2020

दो पग तो साथ चलो....

इस जीवन की लीला  में, कुछ पल  हमारे  बेहतर  हो,
कुछ तुम बोलो कुछ हम,जरा तुम दो पग तो साथ चलो।

इस  भीषण  दुपहरी  में, जब  हमने  इतने  कष्ट  सहे,
बादल की बरसती  बूँदे,अब  बनकर  तुम  साथ  रहो।

तेरे मेरे की खींच तान में,रिश्तों की ये चादर फट न पड़े,
प्रेम धागा  बन  कर  तुम,तुरपाई रिश्तों की भी कर देना।

कठिन समय जब आए,ठहराव रिश्तों में जब आ जाए,
शीतल बयार  बन  कर,तन मन को पुल्कित  कर देना।

कर्मकाण्ड नहीं जाना मैंने,धर्म जाति नहीं कभी कोई माना,
मैंने बस तुमको जाना  है ,तुम अब साथ  मेरा  निभा  देना।

              मंजु पांगती" मन"मुनस्यारी पिथौरागढ़

बिटिया

मेरे जीवन की बगिया में  तुम,
हंसती मुस्काती सी कलिका हो।
दिल  की  हर  धड़कन  मेरी,
तुम आती जाती वह सांसे हो।
     रक्त प्रवाह मेरे शरीर का जो,
      मुस्कान से तेरी संचरित होता।
      जम जाता हर बार खून मेरा,
       जब-जब दिल तुम्हारा दुखता।
तेरे हंसने से बगिया में मेरी,
बसंत ॠतु का आगमन होता।
नहीं चाहती पतझड़ भी आए,
कभी मेरी कलिका को बिखराने।
       खुशबू तुम्हारी फैले जग में यूँ,
        उपवन मेरा सुवासित  होगा।
        हे!कलिके तुम यूँ खिल उठना
        जन्म लेना तुम्हारा सार्थक होगा।

                   मंजु पांगती "मन"मुनस्यारी पिथौरागढ़



(विज्ञान गल्प ) मीरा का खेत कक्षा 3,4,व 5के लिए

       आज मीरा बहुत खुश थी।लाॅकडाउन के कारण उसका परिवार गाँव आया था।शहर की घुटन भरी जिंदगी ने उस मासूम कली को प्राकृतिक रूप से पनपने का अवस...