वो बचपन के खेल सुहाने याद आए हैं आज,
हमने भी पैरों के छाप छोड़े थे खयालोंं के समुंदर मेंं।
बचपन की वो कल्पनाऐं जैसे कच्ची मिट्टी के घरोंदे,
मन बावरा फिर निकल पड़ा आज छाया पकड़ने समुंदर में।
रेत की मानिंद ढ़ह गये सपने सारे बचपन के,
मिलते ही जैसे नदियों का पानी हो जाता खारा समुंदर मेंं।
उम्र निकल रही है अब जैसे बंद मुट्ठी की रेत,
वो बचपन हिलोरें मार रहा फिर से जैसे लहरें समुंदर मेंं।
मंजु पांगती
हमने भी पैरों के छाप छोड़े थे खयालोंं के समुंदर मेंं।
बचपन की वो कल्पनाऐं जैसे कच्ची मिट्टी के घरोंदे,
मन बावरा फिर निकल पड़ा आज छाया पकड़ने समुंदर में।
रेत की मानिंद ढ़ह गये सपने सारे बचपन के,
मिलते ही जैसे नदियों का पानी हो जाता खारा समुंदर मेंं।
उम्र निकल रही है अब जैसे बंद मुट्ठी की रेत,
वो बचपन हिलोरें मार रहा फिर से जैसे लहरें समुंदर मेंं।
मंजु पांगती
No comments:
Post a Comment