मेरे जीवन की बगिया में तुम,
हंसती मुस्काती सी कलिका हो।
दिल की हर धड़कन मेरी,
तुम आती जाती वह सांसे हो।
रक्त प्रवाह मेरे शरीर का जो,
मुस्कान से तेरी संचरित होता।
जम जाता हर बार खून मेरा,
जब-जब दिल तुम्हारा दुखता।
तेरे हंसने से बगिया में मेरी,
बसंत ॠतु का आगमन होता।
नहीं चाहती पतझड़ भी आए,
कभी मेरी कलिका को बिखराने।
खुशबू तुम्हारी फैले जग में यूँ,
उपवन मेरा सुवासित होगा।
हे!कलिके तुम यूँ खिल उठना
जन्म लेना तुम्हारा सार्थक होगा।
मंजु पांगती "मन"मुनस्यारी पिथौरागढ़
हंसती मुस्काती सी कलिका हो।
दिल की हर धड़कन मेरी,
तुम आती जाती वह सांसे हो।
रक्त प्रवाह मेरे शरीर का जो,
मुस्कान से तेरी संचरित होता।
जम जाता हर बार खून मेरा,
जब-जब दिल तुम्हारा दुखता।
तेरे हंसने से बगिया में मेरी,
बसंत ॠतु का आगमन होता।
नहीं चाहती पतझड़ भी आए,
कभी मेरी कलिका को बिखराने।
खुशबू तुम्हारी फैले जग में यूँ,
उपवन मेरा सुवासित होगा।
हे!कलिके तुम यूँ खिल उठना
जन्म लेना तुम्हारा सार्थक होगा।
मंजु पांगती "मन"मुनस्यारी पिथौरागढ़
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