Monday, June 15, 2020

"जब मुझको साँप ने काटा। कक्षा- 3पाठ 12

एक छोटा सा साँप, रेंगे  रहा  था  आँगन  में।
डर गया देख मुझे,घुस गया नारियल खोल में ।।

मुँह बंद कर खोल का,मैं लेगया  नानी के  पास।
निकली चीख नानी की,जोर से बोली साँप-साँप।।

सुनकर  चीख  नानी की , आए  नाना   दौड़   कर ।
फैंक नारियल खोल को,जान बची साँप की भागकर।।

नाना  लगे   समझाने ,ऐसा  काम  न  करना  फिर ।
होते साँप जहरीले हैं,खतरा  मोल  न  लेना  फिर ।।

उसी शाम फिर से  मैं  ,   लगा  पकड़ने  बर्र   को ।
काट खाया उसने मुझे, सह  न  सका  मैं  दर्द को ।।

नीली पड़ी थी अंगुली,दिखाने गया  मैं   नानी  को ।
लेकर  मुझे  गोद  में , नाना  जी  दौड़े  बाहर  को ।।

बाग-बगीचे ,खेतों को , लाँघे-फांदे  , भागे-भागे ।
छोटी सी एक झोपड़ी के,सम्मुख जाकर वे रूके ।।

एक  बूढ़ा  सा  आदमी , निकला  घर से   बाहर ।
सर्प  दंश  के  मंत्र  से   , था निकालता वो जहर ।।

देखी अंगुली मेरी जब , बिठा दिया मुझे चुपचाप ।
पीतल पात्र में पानी ला,करने लगा मंत्र का जाप ।।

कोशिश की मैने बहुत,बताने  की  असली  बात ।
कस कर पकड़े दादा ,हर बार पड़ी मुझे डांट। ।

दर्द मेरा जा चुका था,कौन  सुनता  मेरी बात ।
झाड़-फूंक चलती रही,सहना पड़ा सब बेबात। ।

नानी और पड़ोस सब,देख तमाशा थे उदास ।
कुछ भी न बोलने की,दी हिदायत मुझे खास ।।

मंत्र   पढ़े  उस  पानी  से , अंगुली  मेरी  धोई  गई  ।
उस पानी को पिलाकर,जान में जान सबकी आई।।

गर्व से तब बूढ़ा बोला ,समय  से  आए  मेरे पास ।
जहरीले सर्प  दंश  से, वर्ना न बचता बच्चा  आज।।

नतमस्तक थे सभी , खुद को  समझ रहे थे  धन्य ।
घर पहुँच कर नाना ने,भेजी  खुशी  से  भेंटें अन्य।।

मंजु पांगती
प्र.अ. रा.प्रा.वि.ग्वालदम (थारली )चमोली।

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