अपने चमन की मासूम कलियाँ,
खिलने को बेताब थी,
पर वे तो अनजान थी,
चमन मेंं पलते हुए दरिंदों से।।
चिकनी-चुपड़ी बातों से उनकी,
कलियाँ ज्योंही महक उठी,
नापाक इरादों ने तब छीनी,
उनके चेहरे की नूरानी।।
डरी सहमी असमंजस मेंं थी वो,
समझ न सकी हालातों को,
पलक झपकते रौंद दिया तब,
उन कमसिन,सुकुमार कलियों को।।
चीत्कार से गूँज उठा अम्बर,
धरती की छाती फट पड़ी,
भूल गया वह वहशी दरिंदा,
बेटी उसके घर में भी थी।।
मंजु पांगती
खिलने को बेताब थी,
पर वे तो अनजान थी,
चमन मेंं पलते हुए दरिंदों से।।
चिकनी-चुपड़ी बातों से उनकी,
कलियाँ ज्योंही महक उठी,
नापाक इरादों ने तब छीनी,
उनके चेहरे की नूरानी।।
डरी सहमी असमंजस मेंं थी वो,
समझ न सकी हालातों को,
पलक झपकते रौंद दिया तब,
उन कमसिन,सुकुमार कलियों को।।
चीत्कार से गूँज उठा अम्बर,
धरती की छाती फट पड़ी,
भूल गया वह वहशी दरिंदा,
बेटी उसके घर में भी थी।।
मंजु पांगती
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