आजाद हैं लब मेरे
फिर भी हम कुछ कह न सके,
सही गलत सब देख रहे हैं
फिर भी हम कुछ कह न सके।
हृदय द्रवित है मन बोझिल है,
लानत खुद को भेज रहे हैं।
मोमबत्ती संग प्रतिशोध जला कर,
फिर भी हम कुछ न सके।
दलित हत्याऐं मन कचोट रही हैं,
मानव मानव पर हावी है,
समरसता की चाह सभी को,
फिर भी हम कुछ कह न सके।
मंजु पांगती
फिर भी हम कुछ कह न सके,
सही गलत सब देख रहे हैं
फिर भी हम कुछ कह न सके।
हृदय द्रवित है मन बोझिल है,
लानत खुद को भेज रहे हैं।
मोमबत्ती संग प्रतिशोध जला कर,
फिर भी हम कुछ न सके।
दलित हत्याऐं मन कचोट रही हैं,
मानव मानव पर हावी है,
समरसता की चाह सभी को,
फिर भी हम कुछ कह न सके।
मंजु पांगती
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