अच्छे होते तरू सभी,उनके नाम अनेक।
रसाल,कदली,नारियल,भाये तुरन्त देख।।
घर खोजने का विचार,आया उनको आज।
सोचा था हो जाएगा, पूरा उनका काज।।
गर्मी की दुपहरी में , चले तीनो भ्रात।
देख कर पेड़ आम का ,बैठ गये सब साथ।।
भूख लगी थी जोरो से , तन मांगे आराम ।
खा मीठा आम वहाँ , बना अग्रज का धाम।।
अचार व अमचूर बना , मिलेगा अच्छा दाम ।
बाकी फल पक जाने पर,होगा खाने का काम।।
बढ़ चले दोनों आगे , देखी कदली डाल।
तभी काले बदल ने,चल दी अपनी चाल ।।
भीगने से बचने को ,लाये केला पत्ता तोड़।
छतरी बनी प्यारी-सी,थाली भी बेजोड़ ।।
भोजन और केला खा,नाचा मन का मोर ।
यहीं रहूँगा सोच कर ,हुआ भाव विभोर ।।
सब्जी बनेगी केले की,खाऊँगा भी खूब ।
भर-भर पेटी बेचूंगा ,बनूंगा मैं मजबूत ।।
चल लिया आगे छोटा,मिला नारियल पेड़।
वह पतला लम्बा सा था,लगे नारियल ढेर।।
मीठे नारियल पानी से,बूझाई उसने प्यास।
उस छोटी छाया में बैठ,सोच रहा कुछ खास।
नीम रबड़ के पेड़ की,सोच रहा वह खूबी ।
अब नारियल पेड़ तले,रहने की उसको सूझी।।
मंजु पांगती
प्र.अ.
रा.प्रा.वि.ग्वालदम
रसाल,कदली,नारियल,भाये तुरन्त देख।।
घर खोजने का विचार,आया उनको आज।
सोचा था हो जाएगा, पूरा उनका काज।।
गर्मी की दुपहरी में , चले तीनो भ्रात।
देख कर पेड़ आम का ,बैठ गये सब साथ।।
भूख लगी थी जोरो से , तन मांगे आराम ।
खा मीठा आम वहाँ , बना अग्रज का धाम।।
अचार व अमचूर बना , मिलेगा अच्छा दाम ।
बाकी फल पक जाने पर,होगा खाने का काम।।
बढ़ चले दोनों आगे , देखी कदली डाल।
तभी काले बदल ने,चल दी अपनी चाल ।।
भीगने से बचने को ,लाये केला पत्ता तोड़।
छतरी बनी प्यारी-सी,थाली भी बेजोड़ ।।
भोजन और केला खा,नाचा मन का मोर ।
यहीं रहूँगा सोच कर ,हुआ भाव विभोर ।।
सब्जी बनेगी केले की,खाऊँगा भी खूब ।
भर-भर पेटी बेचूंगा ,बनूंगा मैं मजबूत ।।
चल लिया आगे छोटा,मिला नारियल पेड़।
वह पतला लम्बा सा था,लगे नारियल ढेर।।
मीठे नारियल पानी से,बूझाई उसने प्यास।
उस छोटी छाया में बैठ,सोच रहा कुछ खास।
नीम रबड़ के पेड़ की,सोच रहा वह खूबी ।
अब नारियल पेड़ तले,रहने की उसको सूझी।।
मंजु पांगती
प्र.अ.
रा.प्रा.वि.ग्वालदम
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