Thursday, June 11, 2020

शून्य की अवधारणा

आओ बच्चों आज खेलें एक खेल,
गिनती की जिसमें रेलम पेल।
एक से एक मिलकर बनती,
रेल गिनती की आगे बढ़ती।

बीच बीच में भाई स्टेशन आते,
इकाई के अंक दुहराऐ जाते।
इकाई दहाई,सैकड़ा,हजार,
दस हजार,लाख,दस लाख ।

और भी आगे स्टेशन आते,
करोड़,दस करोड़ , अरब।
दस अरब,खरब,दस खरब,
नील,दस नील और अनंत।

फिर भी  हम  कुछ  भूल  रहे,
गिनती बिन जिसके अधूरी रहे।
कैसे बना दहाई ,कैसे  सैकड़ा,
हम को तब कुछ सोचना पड़ा।

एक करामाती हमें अंक मिला,
नाम उसका तब  शून्य  रखा।
गिनती  की रेल  सरपट भागी,
पूर्णता,सरलता गिनती ने पायी।

अकेले शून्य का  कोई  मान  नहीं ,
अंकों संग मिल बढ़ता सम्मान वहीं ।
शून्य की महिमा अब जानो भाई,
मस्ती से  बन  जाए  अब  दहाई।

दहाई  माने  दस  गुना  जानों,
इकाई में एक शून्य  लगाओ।
एक दहाई दस,दो दहाई बीस,
अंत में पहुँचो दस दहाई सौ।

सौ  माने  सैकड़ा  जानों
इकाई में दो शून्य लगाओ।
एक सैकड़ा सौ,दो सैकड़ा दो सौ,
अंत में पहुँचो सौ दहाई हजार ।

हजार माने हजार ही जानों,
इकाई में शून्य तीन लगाओ।
ऐसे ही गिनती आगे बढ़ाओ,
साथ- साथ में गाते जाओ।

शून्य कितना करामाती  है,
इसकी खोज भारत ने की है।
गिनते-गिनते जब थक जाय,
संख्या वह अनंत कहलाय।

मंजु पांगती
प्र. अ.
रा.प्रा.वि.ग्वालदम






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