बूढ़ी अम्मा जो रहती अकेली,बहुत पुरानी है यह तो बात।
खुद ही करती थी काम सारा,कोई नहीं रहता था उसके साथ।।
चूल्हा-चौका,बर्तन-पानी करती,एक बात से होती थी हैरान।
आँगन झाड़ने जैसे झुकती वो ,करता आसमान उसे परेशान।।
झुकी नहीं ज्यों ही झाडू ले कर,टकरा जाताआसमान पीठ पर।
घूरती उसे बुढ़िया गुस्से से जब,आसमान पीछे को जाता हट।।
एक बार नहीं दो-तीन दफा,रोज-रोज ऐसा ही होता रहा।
अम्मा झुकती झाड़ने कोआँगन,आसमान तंग करता रहता।।
एकदिन पनघट पर पानीभरते,झगड़ा किसी से हुआअम्माका।
घर आकर आँगन लगी झाड़ने,आसमान ने बुढ़िया को छेड़ा ।।
बहुत गुस्से में थी आज बुढिया,झाडू से देमारा आसमान को।
आदत से मजबूर गगन था,बार-बार छेड़ा उसने बुढ़िया को ।।
शरारत सूझी आसमान को,झाडू पकड़ खींचा बुढिया को।
इकलौता झाडू है यह मेरा,बुढ़िया ने पकड़ा कसकर झाडूको।।
रस्साकशी हुई देर तक,आसमान ऊपर को अब उठने लगा।
चिल्लाई बुढ़िया छोड़ो,नभ बोला झाडू अब वहीं लगाना।।
बुढ़िया पड़ गई आफत में, झाडू को अब वो कैसे छोड़े।
तभी अम्मा को चाँद दिखा, अपने पैर वहाँ पर जमा दिये ।।
आसमान ने सोचा अब तो,चंदा बुढ़िया की तो मदद करेगा।
हार मेरी निश्चित होनी है,यह सोच उसने झाडू को छोड़ा ।।
इतनी थक गई थी बुढ़िया,झाडू पकड़े बैठी रह गई चाँद पर।
आसमान तो चला गया था,अम्मा न लौटी कभी धरती पर ।।
मंजु पांगती
प्र.अ.रा.प्रा.वि.ग्वालदम (थराली)चमोली
खुद ही करती थी काम सारा,कोई नहीं रहता था उसके साथ।।
चूल्हा-चौका,बर्तन-पानी करती,एक बात से होती थी हैरान।
आँगन झाड़ने जैसे झुकती वो ,करता आसमान उसे परेशान।।
झुकी नहीं ज्यों ही झाडू ले कर,टकरा जाताआसमान पीठ पर।
घूरती उसे बुढ़िया गुस्से से जब,आसमान पीछे को जाता हट।।
एक बार नहीं दो-तीन दफा,रोज-रोज ऐसा ही होता रहा।
अम्मा झुकती झाड़ने कोआँगन,आसमान तंग करता रहता।।
एकदिन पनघट पर पानीभरते,झगड़ा किसी से हुआअम्माका।
घर आकर आँगन लगी झाड़ने,आसमान ने बुढ़िया को छेड़ा ।।
बहुत गुस्से में थी आज बुढिया,झाडू से देमारा आसमान को।
आदत से मजबूर गगन था,बार-बार छेड़ा उसने बुढ़िया को ।।
शरारत सूझी आसमान को,झाडू पकड़ खींचा बुढिया को।
इकलौता झाडू है यह मेरा,बुढ़िया ने पकड़ा कसकर झाडूको।।
रस्साकशी हुई देर तक,आसमान ऊपर को अब उठने लगा।
चिल्लाई बुढ़िया छोड़ो,नभ बोला झाडू अब वहीं लगाना।।
बुढ़िया पड़ गई आफत में, झाडू को अब वो कैसे छोड़े।
तभी अम्मा को चाँद दिखा, अपने पैर वहाँ पर जमा दिये ।।
आसमान ने सोचा अब तो,चंदा बुढ़िया की तो मदद करेगा।
हार मेरी निश्चित होनी है,यह सोच उसने झाडू को छोड़ा ।।
इतनी थक गई थी बुढ़िया,झाडू पकड़े बैठी रह गई चाँद पर।
आसमान तो चला गया था,अम्मा न लौटी कभी धरती पर ।।
मंजु पांगती
प्र.अ.रा.प्रा.वि.ग्वालदम (थराली)चमोली
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